"सपना" (कविता)

मैने एक सपना देखा,
सपने में समस्त विश्वजन को अपना देखा |
एक बाग में बड़े खुबसूरत फूल खिले थे,
उसी फूल के सभी पंखुड़ी बने थे |
बिना भेदभाव के वे गले मिले थे,
उनके गिले -शिकवे खत्म हो चले थे |
सभी ईमान के सच्चे  थे ,
उनके इरादे एकदम पक्के थे |
उनका स्वच्छ निर्मल ह्दय उनका आईना था,
ईमानदारी ही उनके जीवन का सबसे बड़ा माइना था |
मुझ पर उनका आर्शीवाद था ,
मेरे लिए यही प्रसाद था |
उनमें एकता की भावना प्रबल थी ,
तत्क्षण मेरी नींद गई खुल |
पर मै इस सपने को नहीं चाहती थी भूल ,
मैने देखा कलियुग की चारो तरफ उड़ रही थी धूल ||

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